Rhyming Thoughts Platter

Thoughts that I want to share with the world. Thoughts which are desperate to transform into words….


3 Comments

राजनैतिक अखाडा

हमारे देश का राजनैतिक अखाडा हमेशा ही गरम रहता है और आये दिन कोई न कोई चर्चा इस अखाड़े की शोभा बढाती है.  वैसे तो चर्चा अगर किसी बात की हो तो उस विषय के सारे पहलु सामने आते हैं, और इस मंच पर चर्चा से कहीं न कहीं देश की तरक्की जुडी होती है.  मगर सवाल ये है कि ये चर्चा किन विषयों पर हों, विषयों का चुनाव किस बुनियाद पर हो और चर्चा किस हद तक हो?

हाल ही में चर्चा का विषय बना सुपरस्टार शाहरुख़ खान कि टिपण्णी जिसमें उन्होंने आइ.पी.एल मैच में पाकिस्तानी खिलाडियों को जगह न दिए जाने पर खेद जताया.  अब ये बात किसी राजनैतिक दल को नहीं भाई और उस दल के कार्यकर्ता शाहरुख़ खान के विरोध में सड़कों पर उतर आये और उनके पुतले जलाये.  साथ में धमकी भी दी कि उनकी आने वाली फिल्म को रिलीज़ नहीं होने देंगे और काफी हद तक कामयाब भी रहे.  अब सवाल ये है कि ये राजनैतिक दल जो इस तरह से अपनी आवाज़ उठाते हैं, ये देश के हित के लिए है या बस अपने आप को लोगों और मीडिया में लोकप्रिय बनाने के लिए.  वैसे तो हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा धर्मं-निरपेक्ष देश है. यहाँ के संविधान को अपने निश्पख्स्ता के लिए सारे विश्व में सराहा जाता है. इस संविधान के मूल अधिकारों में से एक है, अभिव्यक्ति का अधिकार.  इसके अनुसार यहाँ के हर नागरिक को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है.  यहाँ के नागरिक होने के कारण शाहरुख़ खान को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है.  अगर किसी को इस बात से आपत्ति है तो वाद-विवाद करे.  वाद विवाद के द्वार हमेशा खुले हैं.  इस तरह उग्र हो जाना, सड़कों पर उतर आना और आम जनता को परेशान करना कहाँ कि बुद्धिमानी है? और इस तरह संविधान के मूल अधिकारों को चुनौती देना कहाँ की राजनीति?

ये भी सही है कि वाद-विवाद से मसले हमेशा हल नहीं होते.  कभी कभी गंभीर कदम भी उठाने पड़ते हैं.  गंभीर कदम गंभीर मसलों के लिए उठाये जाते हैं.  किसी एक व्यक्ति विशेष कि टिपण्णी मेरे हिसाब से गंभीर विषय नहीं कि जिससे   सड़कों पर मोर्चे निकलना, पुतले जलाना, और तोड़ फोड़ करने जैसे कदम उठाये जायें.

हर राजनैतिक दल के अपने आदर्श, अपने दृष्टिकोण होते हैं.  और ये आदर्श , दृष्टिकोण कहीं न कहीं देश या देश के नागरिकों से जुड़ा होता है.  दल के नेता इन्हीं आदर्शों और दृष्टिकोण के साथ कार्यकर्ताओं को लेकर आगे बढ़ते हैं. लेकिन जब ऐसे अध्याय, उदहारण के तौर पर शाहरुख़ खान केस, अगर जुड़ने लगें तो ये आदर्श और दृष्टिकोण सब खोखले जान पड़ते हैं.  अब इस विषय को इतना खीचते हुए, तोड़-फोड़ करवाना, फिल्म कि रिलीज़ बंद करवाना, ये दादागिरी नहीं तो और क्या है?  इससे राजनैतिक दलों का दृष्टिकोण साफ़ चालकता है.

ये ही क्यूँ कुछ दिन पहले जाने माने क्रिकेट खिलाडी, सचिन तेंदुलकर, ने ये कहा कि वो पहले एक भारतीय हैं, फिर एक मराठी.  अब इस बात से साफ़ देशभक्ति छलकती है, इसपर किसी को क्या आपत्ति हो सकती है?मगर  आपत्ति  हुई,  एक  राजनैतिक दल को, जिन्होंने इस विषय पर काफी शोर शराबा किया.  जिस देश कि एकता और अखंडता पर हम गर्व करते हैं और अनेकता में एकता का नारा लगाते हैं , उसी देश के राजनैतिक दलों को मानो इन सब चीजों का मतलब ही नहीं मालूम.  इससे तो ये साफ़ ज़ाहिर होता है कि ये दल बस अपने बाहुबल से अपना मतलब निकालने में जुटे हुए हैं. देश कि तरक्की से इन्हें कोई मतलब नहीं न ही देश की जनता की सुविधा का ख्याल.  ऐसा विषय जिससे देश कि तरक्की हो सके वैसे विषयों पर आवाज़ उठाने के लिए इनके पास  वक़्त नहीं.  बस मीडिया में छाए रहें यही इनका लक्ष्य है.

इन सब बातों का ये मतलब नहीं कि राजनैतिक दलों को निष्काषित कर देना चाहिए या उन पर किसी प्रकार की रोक लगानी चाहिए.  ऐसा करना भी किसी के अधिकारों का हनन होगा. अपितु उनकी विचारधारा में बदलाव लाया जाना चाहिए जिससे इन सब बेकार के बवाल पर अनुछेद लगे और राजनैतिक दलों का सही उपयोग हो सके, अर्थात देश की तरक्की जैसे कार्य के लिए. इसके लिए ये ज़रूरी है के युवा पीढ़ी सामने आये और इन सब बातों को समझे.

हम बस यही आशा कर सकते हैं कि इन पार्टियों के युवा नेता इन सब बातों को समझेंगे और भटके हुए इन दलों की कमान अपने हाथ में लेकर दल का मार्ग दर्शन सही तरीके से करेंगे.  सही जगह और सही विषय पर आवाज़ उठायेंगे और एक अच्हे राजनैतिक दल होने का कर्त्तव्य निभायेंगे.

Advertisements